मेरी नानी
नानी माँ की कुछ यादें
लो तुमको आज सुनाती हूँ
धूप खिली हो आँगन में
वो बैठ खाट महि मथती थीं
पोछ पसीना माथे का
फिर-फिर पल्ला झलती थीं।
ज्यादा उनके शौक नहीं थे
पर एक शौक निराला था
दाल बीच हो तेज उबाला
ऐसी दाल वो चखती थीं
बेले, बस वो दाल परसतीं
रस वहीं झर देती थीं
क्या कहने थे उनके वल्लाह
लेकिन वो सीधी-साधी थीं।
अपनी बूढ़ा को टेर भर नाना
उनका सुख ले-लेते थे
बच्चों-बहुओं के बीच बैठ
वो बड़े रौब से रहती थीं
जब मौहल्ले हो बुलव्वा
चार बतासे पक्के थे
न उनको कभी नचते देखा
न ढोलक हाथ थिरकते थे
लेकिन उनकी शान यही थी
सब उनके आगे झुकते थे।
ज्यादा कुछ तो याद नहीं
पर एक खटाई याद है
लो मुँह पानी भर आया
बस यादें भर साथ हैं
मेरा उनका संग वर्षों में
चंद लम्हों का होता था
पर उनके आँखों का आँसू
और उनका चुम्बन याद है।
- रुचि शुक्ला
