समय के साथ मेरी समझ का परिदृश्य 'दृष्टि' के माध्यम से आप लोगों के लिये प्रस्तुत है। 2016 से 2026 तक की मेरी इन कविताओं में समाज, जीवन, इन्सान, पर्यावरण आदि का साक्षात्कार देखने को मिलेगा। मुझे उम्मीद है, इस संसार में मेरी समझ को उचित स्थान प्राप्त होगा। मेरी 'दृष्टि' का सर्वांगीण विकास होता रहे, इसी आशा के साथ...रुचि शुक्ला
त्रिभाग कर शरीर के
फिर समा को थाम ले
शरीर से विरक्त हो
आत्मा का भान ले
लय से विमुक्त हो
स्व शिखर को पार कर
निःशब्दता के बोल तू
स्व ही पहचान ले
ध्यान कर ये बोध है
ज्ञान का आनन्द ले।