Tuesday, 13 August 2024

मेरी दुनिया अब सिमटने लगी है



       मेरी दुनिया अब सिमटने लगी है

ख़ूब जतन से सँजोया है ये बसेरा,

और बड़े सलीक़े से सँवारती हूँ इसको।

वही काम, 

वही घर, 

वही बच्चे 

और ताना कुछ ना करने का  

कैसे कहूँ; 

कि थकती नहीं हूँ, 

कभी ऊब भी जाती हूँ ।

आज तो.. कुछ न करूँगी 

कब तक उलझी रहूँगी, 

बिना इतवार के।

मेरे भी कुछ अरमान हैं,

पंख फ़ैला नीले गगन में विचरने के। 

बच्चों की ख़िलखिलाहट, 

घर  का मोह 

और चाहत एक अच्छी दोस्ती की,

बाँधे हुए है इस चौखट से,

सुकून देती है।

और मैं फ़िर उसी उल्लास से जुट जाती हूँ।

कभी बटुए की सोच, 

कभी बच्चों की खुशी के लिए,

कभी उनके प्यार में

या यूँ कहूँ, अब आदत सी हो गई है।

वही काम बार-बार करने की

और अपने घरौंदे में खुश रहने की।

मज़बूरी होती तो शायद अखरती मुझे

मगर मेरी चाहत 

अब यही बन गई है।

हाँ मेरी दुनिया अब सिमटने लगी है

और मैं ख़ुद में ही, संसार देखती हूँ।

                                      रुचि शुक्ला ।।

Wednesday, 13 March 2024

किसान

 


                     किसान

भारत एक कृषि प्रधान देश है

निबंध का पहला वाक्य

याद है ना

भूलना नहीं

दो जून की रोटी के बिना 

राजा और रंक एक ही हैं

देश के लहलहाते खेत

किसीने अपने पसीने से सींचे है

पूस की रात में ठिठुरता हल्कू

कड़कती धूप में हल चलाता सुजान भगत

वही हैं 

जिनकी बदौलत 

आत्मनिर्भर होने का दम भरते हो

ये वही हैं जो 'जय जवान, जय किसान' का नारा नहीं लगाते

इनके पूत सीमा को अपने खून से सींचते हैं

और मिट्टी को अपनी देह का नमक दे 

उर्वरक बनाते हैं

कर्ज में डूबा देश का ये किसान वही है

जिसका ऋण हम दबाए बैठे हैं...

                         रुचि शुक्ला

Tuesday, 12 March 2024

गाँव

                               

    
                          गाँव

गाँव शहर हो गए 

और पड़ोस अजनबी

विश्व गाँव बन गया

और हम वैश्विक 

दूरियाँ नहीं रहीं

पर नजदीकियाँ मिट गईं

कसम से मगर, 

चौपाल तो आज भी सजती है

बस रंगत बदल गई...

                        रुचि शुक्ला