गुलाल
बरसाने की राह में
राधा विरह बन रह गई
रुक्मणी भी साथ रहकर
कब पास या करीब थी
वो द्रोपदी थी
जो बन सखी
कृष्ण की कृष्णा बनी
एक रास था, एक साथ था
एक मित्रता का भाव था
जेल की सी बेड़ियाँ
कब किसे लगी भली
जो मिला, खुला जहाँ
परवान यार चढ़ गया
चलो चलें, हम भी चलें
तुम भी चलो
नई राह पर
कुछ रंग हों, गुलाल हो
दोस्त की सी बात हो...
- रुचि शुक्ला
