Saturday, 27 March 2021

गुलाल

                                गुलाल

बरसाने की राह में

राधा विरह बन रह गई

रुक्मणी भी साथ रहकर

कब पास या करीब थी

वो द्रोपदी थी 

जो बन सखी

कृष्ण की कृष्णा बनी

एक रास था, एक साथ था

एक मित्रता का भाव था

जेल की सी बेड़ियाँ 

कब किसे लगी भली

जो मिला, खुला जहाँ

परवान यार चढ़ गया

चलो चलें, हम भी चलें

तुम भी चलो 

नई राह पर

कुछ रंग हों, गुलाल हो

दोस्त की सी बात हो...

                   - रुचि शुक्ला