Thursday, 23 April 2026

मुसाफ़िर हूँ यारों

 


             मुसाफ़िर हूँ यारों

पनाहगार को दफ़ा करने का

जो सिलसिला चला है

कहाँ तक जाएगा

है ठिकाना, अपना ही किसे पता

सब मेहमाँ हैं, 

फिर जाना ही हक़ीक़त समझ

कोई और ही क़ाबिज़ होगा

अपनी रुख़्सती के पहले

अब पुरखों की खोज

क्या करें

वो भी ख़ानाबदोश ही रहे होंगे

सो हम भी हैं

और तुम भी

अब मुसाफ़िर तुम ही कहो

जो किसी और धारा के हुए

तो कहाँ जाएँगे

आज वक्त है 

तो जी लें सुकूँ से

न दिया वक्त उसने 

तो कहाँ जाएँगे...

              - रुचि शुक्ला

Wednesday, 1 April 2026

सुनेगा कौन


                सुनेगा कौन?

किसी को हो गुमा तो हो

हमें नहीं है

कलम में दम है

हमें यक़ीं नहीं है

दास्ताने जहाँ  की

जीत की ज़ुबानी रहीं

गीत उसी के बने

जहाँ फ़तेह की कहानी रही

कहने को कलम 

इंकलाब लाती है

सच तो ये है

लेखनी उतनी ही बचती है

कि अधूरी सी कहानी सुनाती है

हमारी यादें, हमारी धरोहर

सबकी कुछ सीमाएँ हैं

अश्वत्थामा हतः

इतनी ही सच्चाई है

जो दिखा, जो जाना, जो समझा

वही दायरा बना

सब कुछ है अधूरा सा

पर पूरा फ़साना बना

सब छोड़, दरकिनार कर

भूलना चाहा

चुप रहे तो हुई कोफ़्त 

कि बोलेगा कौन

और कहने पर

यक़ीं नहीं, कि सुनेगा कौन?

                        - रुचि शुक्ला