मुसाफ़िर हूँ यारों
पनाहगार को दफ़ा करने का
जो सिलसिला चला है
कहाँ तक जाएगा
है ठिकाना, अपना ही किसे पता
सब मेहमाँ हैं,
फिर जाना ही हक़ीक़त समझ
कोई और ही क़ाबिज़ होगा
अपनी रुख़्सती के पहले
अब पुरखों की खोज
क्या करें
वो भी ख़ानाबदोश ही रहे होंगे
सो हम भी हैं
और तुम भी
अब मुसाफ़िर तुम ही कहो
जो किसी और धारा के हुए
तो कहाँ जाएँगे
आज वक्त है
तो जी लें सुकूँ से
न दिया वक्त उसने
तो कहाँ जाएँगे...
- रुचि शुक्ला






