मेरी चुप्पी
पर अपनी ही सुता का नाम
सीता रखने से घबराती हूँ।
जिस जहाँ में सिया-राम कह
स्त्री पर उपकार होते हों,
स्व-संगनी का तिरस्कार
पर आम होता हो।
राधे-राधे जप कर भी
राधे छूट जाती हो,
रुक्मणि दम घोट अपना
वर बाँट लेती हो।
उस जहाँ में जन्म ले
युवा हुई हूँ मैं,
पार चालीस हूँ मगर
घर में बग़ावत क्या करूँ,
कुछ सोच बस
इन बुतों को पूज लेती हूँ।
रुचि शुक्ला