कलम आराधना
धन के बिछौने पर
कलम बिराजमान है।
लक्ष्मी का सरस्वती से
क्या नया सरोकार है।
पहले भी कलम ने इतिहास गढ़े थे
यूँ नहीं रावण और राम बने थे।
जब कभी शक्ति का गान हुआ
इस लेखनी का नाच सरेआम हुआ।
नई प्रभा के बोल गा
गुजरते शाह को रज दांव दे
स्व को क्रांतियों का दाता बताना।
ये कलमकार का हुनर रहा
तभी तू पूज्य
और वो कलाकार रहा।
हूँ कुपित
ये निरादर देख बस
ये कृत्य मेरा, उद्गार मान
कर क्षमा।
तूने किये हैं, कई-कई उपकार भी
तेरी कृपा से, वो जी रहे हैं अब तलक
वर्ना तो वे, मर चुके जहान में।
- रुचि शुक्ला