Sunday, 13 April 2025

इश्क

 


                         इश्क

चाँद का दीदार कर

गुदगुदाते मन से आवाज़ आती है

बड़ा खूब है ये फ़ासला

जो आज भी प्यार को समेटे हुए है

आग़ोश से चाँदनी बिखरा रहा वो

उँगलियाँ ज़ुल्फ़ में फहरा रहा हो

आब का आभास देता ये मरुस्थल

बावस्ता मोह में जकड़े खड़ा है 

डोर भी सूत सी कच्ची नहीं है

गई पीढ़ियाँ गवाहियत ये दे रही हैं

बड़ा ख़ूब है ये फ़ासला 

बना रहे बस

मेरे ख्वाब का ये सिलसिला

चलता रहे बस

तुझे देखना, निहारना चाहत रही है

तेरी चाँदनी चूमे युहीं हसरत यही है।

                                      -रुचि शुक्ला