Friday, 4 November 2022

लगन लगाए रखना

                     लगन लगाए रखना

पन्ने पलटने दो

गुजरा हुआ बीत जाने दो

नए सिरे से फिर

पढ़ना सीख लोगी

बस एक बार ये 

आदत तो लगने दो 

समझ बदलेगी

ख़याल बदलेंगे

और जज्बात नया मोड़ लेंगे

नए सिरे से फिर 

लिखना चाहती हो अगर

तो पट्टी को 

अच्छे से साफ कर लो

कोरे कागज़ पर लिखावट

और निखरेगी

तुम कोशिश करना

ईमानदारी रखना

देखना ये नया सफ़र

और खूबसूरत होगा

बस तुम लगन लगाए रखना...

                              रुचि शुक्ला

Wednesday, 30 March 2022

हम, हम और हम

 

                        हम, हम और हम 

हम इन्सान हैं

हमने औकात में रहना नहीं सीखा

बोलना तो आया

मगर कहना नहीं सीखा

कभी डॉली को जन्म दे

पुरुष के अस्तित्व को नकारा 

और कभी आसमा में छेद कर

इतिहास और भविष्य का 

भेद ही मिटा दिया

हम इन्सान हैं

हमने औकात में रहना नहीं सीखा

कभी सूक्ष्मता के पार गए

कभी हर वृहदता को लाँघ गए

हमने मौसम को 

अपने इशारों पर नचाया 

हर ऊँचाई को

अपने पैरों तले रौंदा

क्या बताएँ

हम अपने से बेहतर 

इन्सान बनाने का हुनर रखते हैं

मगर आज भी

जर, जोरू और जमीन

पर लड़ मरते हैं

हम इन्सान हैं

हमने औकात में रहना नहीं सीखा 

हम स्वयंभू बन जाएँ

ये भी संभव है

हम चुनौतियों से इश्क करते हैं

कई इबारतें रोज़ लिखते हैं

नित नई खोज कर

नव आकाश गढ़ते हैं

होनहार, क़ाबिल 

और समझदार हैं हम

उससे भी ज्यादा बीमार हैं हम

कल ही जाना था

ये खेल उतना ही बाकी है

जब तलक ये पटल हमारा है

सब भूल गए

और गुमा ग़ज़ब का हावी है

कि हम, हम और हम 

बस हम ही बाकी हैं।

                            रुचि शुक्ला...


यह कविता YouTube पर सुनने के लिए Please Visit https://youtu.be/UII-Fdaigbw

Tuesday, 29 March 2022

कलरव

 

                             कलरव

जब कलरव करती चिड़िया भी

कोलाहल करती लगती हो

राह दिखाने वाला तुमको 

पथ-भ्रमित कर देता हो

और लगे, थाली में भर-भर

झूठ परोसा जाता है

रुक जाना पलभर को तब

कुछ पन्ने पलटा लेना

दरिया में बहने से पहले

थोड़ा ठोक-बजा लेना

इंद्रधनुष की ओढ़ चुनरिया

थिरक रही किरणों के संग 

पलभर रास रचा लेना

और फैला इन हाथों को

कुछ देर हवा को थाम-जिगर

दिलसाज़-ए-तार हिला लेना

या इठलाती बाला संग

अपने नैन लड़ा लेना

ले हाथों में नन्हा बालक

थोड़ा सा तुतला लेना

हो सम्भव, कुछ देर सही

मिट्टी में लोट लगा लेना

जब बदला सा संसार लगे

सब कुछ बिल्कुल साफ दिखे

तब सीने की धड़कन से 

जो सरगम उठ आएगी

और अपनी मीठी वाणी का 

करतब तुम्हें दिखाएगी

वो सत्य, अहिंसा, सदाचार का

सच्चा पथ दर्शाएगी..

                       रुचि शुक्ला...

Monday, 28 March 2022

चलो साथ चलें

   


                         चलो साथ चलें 

पुरानी यादों में भटकने की क्या जरूरत है

चलो; अभी आज कुछ करें और साथ चलें

कल के चक्कर में पड़ने से बेहतर है

मन भर कर दिल की बात करें

माना अब चाँद शर्माता नहीं है

मगर चाँदनी रात में 

आज भी मन गुदगुदाता है

कभी चलो साथ, और देखो

ये जहाँ बिल्कुल भी बदला नहीं है।

तुम्हें पता है

बादल आज भी संदेशे लाते हैं

बारिश की बूँदों के साथ

खुशियाँ बरसती हैं

सिर्फ तुम हाथ नहीं बढ़ाते

और उन प्यार भरे संदेशों के लिफ़ाफ़े

बिनखुले ही रह जाते हैं

माना वक्त के साथ कुछ बदल गया है

मगर लोग वही हैं

दोस्ती की चाह वही है

कहने और सुनने का मज़ा वही है  

भर तकिया बाहों में किसी के साथ बैठो

चंद लम्हें किसी को देकर तो देखो

दुनिया आज भी बदली नहीं है।

क्यों कैद कर रखा है

और एक बुलबुले में रहते हो

इस छोटी सी दुनिया का विस्तार 

और रंग तुम्हें आज भी 

रोमांच से भर देंगे

आओ चलो देखो 

दुनिया आज भी बदली नहीं है।

                                    रुचि शुक्ला...