Friday, 13 March 2020

अंजाम ए गुलिस्तां क्या होगा

       
          "अंजाम ए  गुलिस्तां क्या होगा"

  जिस हवा ने छूकर मुझे प्यार का अहसास दिया
  मैं उसके तूफां के उपद्रव से डरती हूँ।
  ये बूंद जो मेरी प्यास बुझाती है
  मैं उसकी सुनामी के कहर से डरती हूँ।
  मैं आज अपना हर पल संजोना चाहती हूँ
  मगर उसके कल के आगाज़ से डरती हूँ।
  मैं डरती हूँ; ये अपने ख्वाब की तामीर बनाने वाले
  जब मेरी ज़मी की मिट्टी से खेल जाते हैं।
  राष्ट्र के नाम पर लड़ने और मरने वाले
  इन्सानियत पर दाँव खेल जाते हैं।
  वो भूल जाते हैं उन जेब की कतरन संजोने में
  पूरा दामन यूँही तार-तार हो गया।
  इस गुलिस्ताँ ने कब कहा, वो फूल मेरे बाग के लायक नहीं।
  इन परिंदों ने उड़ते हुए ज़मी की लकीरें नहीं देखीं।
  फिर वो कौन हैं, जो मेरी हद का पैमाना बताते हैं।

                                            रुचि शुक्ला


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