सीख रही हूँ तुमसे अब तक
तुमको क्या मैं सिखाऊँगी?
लालन पालन करने का
मैं कब तक रोब दिखाऊँगी।
खेल-खेल में भोले मन से
तुम क्या, कब कह जाते हो।
मैं मूरख ज्ञानी ध्यानी सी
मोटी बातें करती हूँ।
जब सुनती तेरी बातें
मैं शर्मसार रह जाती हूँ।
कितनी बार लगा ऐसा
ये ख़ता नहीं है क्षम्य मेरी।
है उदार, निश्छल हृदय तू
कहता सबसे प्यारी तू।
मनः घात सा लग जाता है
जो पीर नहीं मिटने वाली।
माँ बन अब मैं सीख रही हूँ
गुमाँ रहित सीधे चलना।
आपे में रख मानस अपना
तेरा मान तुझे देना।
बस इतनी सी बात कहूँ
तू लाज़ मेरी हरदम रखना।
कमियों का जब भान करे
चाहत मेरी आगे रखना।
रुचि शुक्ला
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