Monday, 2 February 2026

एक कहानी


बदलते दौर में एक दिन

मैं बैठी एक किनारे पर

अजब सी कश्मकश में थी

कि कहानी में कहानी हैं

बहुत उलझी हुई सी हैं

न बीता ज्ञात है मुझको

न अगला जान पाती हूँ

अकेले आज में इसके 

गुत्थमगुत्थ सी रहती हूँ

लड़ती, भिड़ती, गिरती-पड़ती

मल्लयुद्ध से रोज़ गुजरती 

इस कहानी में अनजाने

रत्तीभर तो रोज़ बदलती

कितने किरदारों से मिलकर

नौरंगी बौछारों से

तरबतर और ओतप्रोत मैं

थोड़ी ढलती, थोड़ी गढ़ती

नाममात्र पर रोज़ बदलती

इसमें कोई रंज नहीं

न परिकथा सी बात कहीं

है कहानी या स्वप्न कोई

या गतिमान सी लहरें हैं

जिसकी हर बूंदों की अपनी

लम्बी एक कहानी है..

                           रुचि शुक्ला


यह कविता YouTube पर सुनने के लिए Please Visit  https://youtu.be/_LEepq8dFoQ?si=NDDDkwNP76WTz_mR