बदलते दौर में एक दिन
मैं बैठी एक किनारे पर
अजब सी कश्मकश में थी
कि कहानी में कहानी हैं
बहुत उलझी हुई सी हैं
न बीता ज्ञात है मुझको
न अगला जान पाती हूँ
अकेले आज में इसके
गुत्थमगुत्थ सी रहती हूँ
लड़ती, भिड़ती, गिरती-पड़ती
मल्लयुद्ध से रोज़ गुजरती
इस कहानी में अनजाने
रत्तीभर तो रोज़ बदलती
कितने किरदारों से मिलकर
नौरंगी बौछारों से
तरबतर और ओतप्रोत मैं
थोड़ी ढलती, थोड़ी गढ़ती
नाममात्र पर रोज़ बदलती
इसमें कोई रंज नहीं
न परिकथा सी बात कहीं
है कहानी या स्वप्न कोई
या गतिमान सी लहरें हैं
जिसकी हर बूंदों की अपनी
लम्बी एक कहानी है..
रुचि शुक्ला
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