सीखना बाकी है
तुम्हारा जुनून है
तुम श्रष्टि को बदलोगे
स्व को नहीं
उसे कुछ क़ाबिल बनाओगे
तुम लायक हो
समुंदर में धरा
और धरा पर समुंदर बना सकते हो
बहुत से करिश्में, तुम रोज़ दिखाते हो
पर आत्मदम्भ भरने या
आत्ममुग्ध रहने से क्या होता है
कुदरत के करिश्में
का अहसास तब होता है
जब किसी आपदा से सामना होता है
तूफ़ां से पहले की शांति
बढ़ती लौ का सबब
कुछ सिखाता है
मरने से पहले आत्मा का संचार होता है
ढलते दिन और उगते सूरज
से ना समझो कि आज उसका
तो कल तुम्हारा होगा
प्रकृति, नियम यूँ नहीं बदलती
वो विकारों का निवारण जानती है
तुम्हारा खेल तभी तक तुम्हारा है
जब तलक उसकी शह बाक़ी है
वर्ना इतना तो जान लो अभी
सीखना बहुत कुछ बाक़ी है।
- रुचि शुक्ला
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