प्रवासी बालवीर की व्यथा
ना सावन के झूले देखे
ना गुड़िया के रेले।
मेरे देश की माटी के
सुकोमल हैं कैसे।।
बाँह पकड़ चलने वाले
बिन मंज़िल को जाने।
नन्हें पाँव बढ़ते देखे
भूख-प्यास के मारे।।
जिनकी आँखों में सपने हैं
ना आँसू की धारा।
माँ के तन से खेल रहे
जो पड़ी राह मृतकाया।।
जिनने ना तो पैसा देखा
ना पैसे की माया।
देख रहे ये जीवन की
कितनी गंदी छाया।।
हृदय विदारक दृश्य देख
हर मानाव मन मचलाय।
शायद कुछ तो बदल सकें
इस बदले जग का साया।।
उठो करो, कुछ तो कर दो
ना रोने दो बेचारा।
सब सोचेंगे तब आएँगे
बीते दिन दोबारा।।
रुचि शुक्ला
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