समझ अपनी-अपनी
मेरी समझ तुमसे अलग है
ये मेरा नजरिया है।
तुम किन अर्थों में लो मुझे
ये तुम पर है।
चाहे लालिमा को प्यार से जोड़ लो
या रक्त रंजित मान कर, कोहराम मान लो
मैं तो सिर्फ लाल रंग हूँ
तुम्हें जो अच्छा लगे वो जान लो।
तुम मेरी धारा को प्यासा कहो
और समुद्र को दिलबर
या मुझे माँ मान कर पूज लो, ये तुम जानो
मैं तो एक नदी हूँ और अपनी गति में हूँ।
कौन कब, क्या, क्यों, किसे कैसे ले
ये हक है उसका।
मेरा गाना, मेरा हँसना और यूँ कहना
कई अर्थों में अलग सही
पर इसे कौन, कब, कैसे परिभाषित करे
ये उन पर है।
- रुचि शुक्ला
