Sunday, 13 April 2025

इश्क

 


                         इश्क

चाँद का दीदार कर

गुदगुदाते मन से आवाज़ आती है

बड़ा खूब है ये फ़ासला

जो आज भी प्यार को समेटे हुए है

आग़ोश से चाँदनी बिखरा रहा वो

उँगलियाँ ज़ुल्फ़ में फहरा रहा हो

आब का आभास देता ये मरुस्थल

बावस्ता मोह में जकड़े खड़ा है 

डोर भी सूत सी कच्ची नहीं है

गई पीढ़ियाँ गवाहियत ये दे रही हैं

बड़ा ख़ूब है ये फ़ासला 

बना रहे बस

मेरे ख्वाब का ये सिलसिला

चलता रहे बस

तुझे देखना, निहारना चाहत रही है

तेरी चाँदनी चूमे युहीं हसरत यही है।

                                      -रुचि शुक्ला


Monday, 31 March 2025

तुम आगे बढ़ो

  

               तुम आगे बढ़ो

हर नज़र अलग ही चित्र बनाती रही

हर किसी का अलग था नज़ारेवयां

गिले-शिकवे, शिकायतें सभी की रहीं

जो ब्योरा दिया, वो कुछ और था

जो निरूपित हुआ, वो अलग बात थी 

कदाचित आयाम का फेर था

और तस्वीर क्या-से-क्या बन गई

वो तस्वीर थी, तो छोड़ो उसे

वो तुम नहीं 

तुम तो आगे बढ़ो

ये क्षितिज बस नजर का फेर है

इसमें क्या और कैसी दलील

स्याद् पर बात हो 

तो कुछ पहलू भी हों

बस एक सच रहे 

तो क्या बात हो

तुम आगे बढ़ो 

बस आगे बढ़ो

फिक्र दुनिया-जमाने की 

किनारे धरो

तुम आगे बढ़ो...

                - रुचि शुक्ला


Friday, 28 March 2025

वो साथ थी

                            


                        वो साथ थी

वो ताउम्र मेरे साथ थी

मेरी सच्ची राज़दार थी

हर कमी जानती थी

मेरी खूबियाँ पहचानती थी

मेरी गलतियाँ मेरे मुँह पर बताती थी

वो डराती नहीं थी

मुझे जीत का रास्ता सुझाती थी।

जब भी थकी  

उसकी गोद हाज़िर थी

वो कब, कैसे, क्या जादू कर देती

पता नहीं

पर हर बार, नई जान फूँक देती थी

मेरे साथ मेरे विचारों की उथलपुथल

उसकी अपनी ही थी

भावुक सी दिखने वाली वो

कब क्या केमिकल लोचा कर देती 

पता नहीं 

हर उलझन से बेख़बर हो

मैं नई राह पर

बड़े शान से बढ़ चलती।

सच्ची सहेली, हमसफर, जान

आज भी मेरे साथ है

मेरा उस पर भरोसा

कुछ इस कदर है

कि वो है तो मैं हूँ

और मेरा होना उसी से है..

                            रुचि शुक्ला