Monday, 9 August 2021

क्या संदेशा लाया है


                  क्या संदेशा लाया है

ए बादल तू सीने में क्या छिपा के लाया है

ऐसा क्या संदेशा है 

जो उसने भिजवाया है

चिड़िया चहक रहीं हैं इतनी

वो भी कुछ तो बोल रही हैं

क्या तूने इनके कानों में

दिल का राज़ बताया है

ए बादल तू सीने में क्या छिपा के लाया है।


पानी की रिमझिम ये बूंदें

सुरमयी बोली बोल रही हैं

तेज़ हवा का झोंका जैसे

दिल में मिश्री घोल रहा है

क्या तूने इनके कानों में

दिल का राज़ बताया है

ए बादल तू सीने में क्या छिपा के लाया है।


चन्दा मामा लुकछुप कर यूँ 

क्या इशारा करते हैं

तेरी ओट से झाँक ये तारे

बार-बार कुछ कहते हैं

क्या तूने इनके कानों में

दिल का राज़ बताया है

ए बादल तू सीने में क्या छिपा के लाया है।


मैं तो हूँ नन्हा सा बालक

उल्टा-पुल्टा क्या जानूँ

ऐसा-वैसा कहने से तो

सीधे ये बतला दे तू

क्या तूने इनके कानों में

दिल का राज़ बताया है

ए बादल तू सीने में क्या छिपा के लाया है।

                                           -रुचि शुक्ला


यह कविता YouTube पर सुनने के लिए please visit https://youtu.be/wThPLlYlSkA

Thursday, 20 May 2021

कहाँ हैं आप ?

                 

 

                         कहाँ हैं आप ?

अब धरा भी थक चुकी, इस क़दर संताप से

और सिहरती है हवा, इस सुलगते ताप से  

हाय गँगा का बिलख कर, अब कलेजा फट चुका

और सिसकती रूह का दुःख, शूल सा चुभने लगा


है सही ये इस जहाँ पे, घोर विपदा आ पड़ी

गिद्ध भी मंडरा रहे हैं, देवता से दूत भी

इस समर की ये गति, चहुँओर लाशें बिछ रहीं

रोगहारी बन चिकित्सक, निश्शस्त्र हैं पर भीड़ रहे


ये रविश भी क्या रविश, जो पूछ लो तो पाप है

प्रश्न है, वो हैं कहाँ? जो कल तलक थे मंच पर

और ठोकते थे ताल जो, इस जहाँ के हैं ख़ुदा

हाल यूँ बेहाल है, पर छबि का भान है

और गुमा की बात क्या, उनके धरा न पाँव हैं...

                                     - रुचि शुक्ला


Wednesday, 12 May 2021

मेरा क़सूर

   


                           मेरा क़सूर

डूबती नाव का खेवैया सो रहा है

आधा हुजूम क्या कहें, किसी नशे में है

पर्दा नज़र पर डाल वो 

सच को छुपा रहा

सोच का विकार मान

जग को घुमा रहा

जो मर गए, वो मर गए

उनकी क्या बात हो

जो जी गए

उत्सव चलो उन्हीं के साथ हो

दोष गिन कब तलक खफ़ा रहोगे तुम

यकीं करो हर घाव का इलाज़ वक्त है

देखना एक रोज़ तुम आप कहोगे

शायद मेरी समझ में ही 

कहीं कुछ फेर था

वर्ना इस जहाँ में

कुछ भी तो कम नहीं....

                       रुचि शुक्ला....

Monday, 19 April 2021

मृदुल याद

  


                        मृदुल याद

रह-रह कर भूली-बिसरी सब 

मृदुल याद सी आती हैं।

जैसे कि गीली मिट्टी से

भीनी सी खुशबू आती है।

वो मेरी नानी का घर था

जिसकी खूब कहानी हैं।

वो मेरे बचपन के दिन थे

मुझको याद जुबानी हैं।

लोट न थकते धूले में

फिर भर-भर लोट नहाते थे।

तपते घामे खेल खिलोने

बारिश के ओले खाते थे।

कितने सारे भाई-बहन थे

लड़ते और मनाते थे।

लोगों से पिटने के डर से

कई-कई बात छिपाते थे।

इस छज्जे जो देखे कोई

उस छज्जे कूद लगाते थे।

छक जाएँ घर वाले सब

इतनी धूम मचाते थे।

शादी और बरातों के

मीठे पान भी खाते थे।

माँ पूछे जो, क्या खाया है

जामुन का नाम लगाते थे।

एक बार बस, कह दे कोई

झट अपना नाच दिखाते थे।

मौसी, गुड़िया सी देती थी

मामी से बरतन लाते थे।

गुड्डा तेरा, गुड़िया मेरी..

तू बाराती, मैं जनाती..

क्या-क्या बातें करते थे

दीदी से डाँट भी सुनते थे।

लेकिन फिर बसअड्डे की

चाट-पकौड़ी खाते थे।

चूरण वाले का चूरण खा

चट-चट मुँह चटखाते थे।

कभी बर्फ का गोला खाते

कभी समोसा पार लगाते।

घर के बाहर लगे वृक्ष पर

जल भी थे हम रोज चढ़ाते।

आज परीक्षाफल न आए

बाल चाह बस इतनी करते।

रात को छत पर तारे गिनते

ढेर कहानी मन-भर सुनते।

कुछ नानी की, कुछ मामा की

कुछ नाना की थीं अलग कहानी।

सबका मनका अलग-अलग था

मन का उनसे तार लगा था।

क्या दिन थे, क्या रातें थीं

बस यूँहीं कट जाती थीं।

फिर विदा का भर पिटारा

अपने घर आ जाते थे।

ऐसी थी गर्मी की छुट्टी  

कितनी कमतर लगती थीं।

जैसे हों कल की ही बातें

ताज़ी-ताज़ी लगती हैं।

                             रुचि शुक्ला

Saturday, 27 March 2021

गुलाल

                                गुलाल

बरसाने की राह में

राधा विरह बन रह गई

रुक्मणी भी साथ रहकर

कब पास या करीब थी

वो द्रोपदी थी 

जो बन सखी

कृष्ण की कृष्णा बनी

एक रास था, एक साथ था

एक मित्रता का भाव था

जेल की सी बेड़ियाँ 

कब किसे लगी भली

जो मिला, खुला जहाँ

परवान यार चढ़ गया

चलो चलें, हम भी चलें

तुम भी चलो 

नई राह पर

कुछ रंग हों, गुलाल हो

दोस्त की सी बात हो...

                   - रुचि शुक्ला

Wednesday, 17 February 2021

कलम आराधना

 

                        कलम आराधना

धन के बिछौने पर

कलम बिराजमान है।

लक्ष्मी का सरस्वती से

क्या नया सरोकार है।

पहले भी कलम ने इतिहास गढ़े थे

यूँ नहीं रावण और राम बने थे।

जब कभी शक्ति का गान हुआ

इस लेखनी का नाच सरेआम हुआ।

नई प्रभा के बोल गा

गुजरते शाह को रज दांव दे

स्व को क्रांतियों का दाता बताना।

ये कलमकार का हुनर रहा

तभी तू पूज्य 

और वो कलाकार रहा।

हूँ कुपित 

ये निरादर देख बस 

ये कृत्य मेरा, उद्गार मान 

कर क्षमा।

तूने किये हैं, कई-कई उपकार भी

तेरी कृपा से, वो जी रहे हैं अब तलक

वर्ना तो वे, मर चुके जहान में।

                               - रुचि शुक्ला 


Saturday, 9 January 2021

समझ अपनी-अपनी


                समझ अपनी-अपनी


मेरी समझ तुमसे अलग है

ये मेरा नजरिया है।

तुम किन अर्थों में लो मुझे

ये तुम पर है।


चाहे लालिमा को प्यार से जोड़ लो

या रक्त रंजित मान कर, कोहराम मान लो

मैं तो सिर्फ लाल रंग हूँ

तुम्हें जो अच्छा लगे वो जान लो।


तुम मेरी धारा को प्यासा कहो

और समुद्र को दिलबर

या मुझे माँ मान कर पूज लो, ये तुम जानो

मैं तो एक नदी हूँ और अपनी गति में हूँ।


कौन कब, क्या, क्यों, किसे कैसे ले

ये हक है उसका।

मेरा गाना, मेरा हँसना और यूँ कहना

कई अर्थों में अलग सही

पर इसे कौन, कब, कैसे परिभाषित करे

ये उन पर है।

                     - रुचि शुक्ला


दुनियादारी


                        दुनियादारी


भौंरा मेरे दर आँगन में; रोज़ आता है।

मुझको लगता है; वो कितना मीठा गाता है।


रंग-रंगीले फूलों से; उसको रिझाता मैं।

खुशबू की आगोश में ले; कुछ पास बुलाता मैं।


धीरे-धीरे पास में आ; वो लौट जाता है।

मेरे फूलों का रस यूँहीं; रोज़ चुराता है।


कितना निरमोही है भौंरा, लोग कहते हैं।

चोर, चतुर, छलिया; होने का दोष देते हैं।


क्या बतलाऊँ तुमको मैं; कुछ और कहानी है।

मेरी डाल लगे फल; उसके सदउपकारी हैं।


उसका मेरा लेना-देना; बहुत पुराना है।

इसको ही तो दुनियादारी; आप कहते हैं।

                                         -रुचि शुक्ला