ख़ूब जतन से सँजोया है ये बसेरा,
और बड़े सलीक़े से सँवारती हूँ इसको।
वही काम,
वही घर,
वही बच्चे
और ताना कुछ ना करने का
कैसे कहूँ;
कि थकती नहीं हूँ,
कभी ऊब भी जाती हूँ ।
आज तो.. कुछ न करूँगी
कब तक उलझी रहूँगी,
बिना इतवार के।
मेरे भी कुछ अरमान हैं,
पंख फ़ैला नीले गगन में विचरने के।
बच्चों की ख़िलखिलाहट,
घर का मोह
और चाहत एक अच्छी दोस्ती की,
बाँधे हुए है इस चौखट से,
सुकून देती है।
और मैं फ़िर उसी उल्लास से जुट जाती हूँ।
कभी बटुए की सोच,
कभी बच्चों की खुशी के लिए,
कभी उनके प्यार में
या यूँ कहूँ, अब आदत सी हो गई है।
वही काम बार-बार करने की
और अपने घरौंदे में खुश रहने की।
मज़बूरी होती तो शायद अखरती मुझे
मगर मेरी चाहत
अब यही बन गई है।
हाँ मेरी दुनिया अब सिमटने लगी है
और मैं ख़ुद में ही, संसार देखती हूँ।
रुचि शुक्ला ।।
