कुदरत की बोली
इस कुदरत की बोली सुनने को
भोर हुए उठ कर देखो।
मन-देह कसो, जड़ चेतन की
कुछ बोल रहीं चिड़ियाँ देखो।
जो मैल भरा मन-बुद्धि में
उसको थोड़ा घिस कर देखो।
ये ताज़ा-ताज़ा ओस गिरी
उसको थोड़ा छू कर देखो।
'मैं' व्यापत इस दुनिया में
कुछ पल खुदसे मिल कर देखो।
जिस आभा से तुम मोहित हो
है राज़ छुपा उसमें देखो।
इस कुदरत की बोली सुनने को
भोर हुए उठ कर देखो।
रुचि शुक्ला
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