Thursday, 20 May 2021

कहाँ हैं आप ?

                 

 

                         कहाँ हैं आप ?

अब धरा भी थक चुकी, इस क़दर संताप से

और सिहरती है हवा, इस सुलगते ताप से  

हाय गँगा का बिलख कर, अब कलेजा फट चुका

और सिसकती रूह का दुःख, शूल सा चुभने लगा


है सही ये इस जहाँ पे, घोर विपदा आ पड़ी

गिद्ध भी मंडरा रहे हैं, देवता से दूत भी

इस समर की ये गति, चहुँओर लाशें बिछ रहीं

रोगहारी बन चिकित्सक, निश्शस्त्र हैं पर भीड़ रहे


ये रविश भी क्या रविश, जो पूछ लो तो पाप है

प्रश्न है, वो हैं कहाँ? जो कल तलक थे मंच पर

और ठोकते थे ताल जो, इस जहाँ के हैं ख़ुदा

हाल यूँ बेहाल है, पर छबि का भान है

और गुमा की बात क्या, उनके धरा न पाँव हैं...

                                     - रुचि शुक्ला


Wednesday, 12 May 2021

मेरा क़सूर

   


                           मेरा क़सूर

डूबती नाव का खेवैया सो रहा है

आधा हुजूम क्या कहें, किसी नशे में है

पर्दा नज़र पर डाल वो 

सच को छुपा रहा

सोच का विकार मान

जग को घुमा रहा

जो मर गए, वो मर गए

उनकी क्या बात हो

जो जी गए

उत्सव चलो उन्हीं के साथ हो

दोष गिन कब तलक खफ़ा रहोगे तुम

यकीं करो हर घाव का इलाज़ वक्त है

देखना एक रोज़ तुम आप कहोगे

शायद मेरी समझ में ही 

कहीं कुछ फेर था

वर्ना इस जहाँ में

कुछ भी तो कम नहीं....

                       रुचि शुक्ला....