मैं गमले का पौधा
मुझे मेरे हिस्से की ज़मी दे दो।
मुझे अपने घर की रौनक समझने वालों
मुझे मेरा खुला आसमाँ दे दो।
ये साख पर लगे फूल
मेरी लाचारी क्या जानें।
ये मुठ्ठी भर धूल है
और छोटा सा घेरा।
कितनी जद्दोजहद से
मैं खींचता हूँ सत।
टूट जाता हूँ
जब मिलता नहीं सुकून।
चमन की बहार, मुझे भी लुभाती है
वो घास भी अपना बिछौना सजाती है।
मेरे हिस्से में बेड़ियाँ क्यों हैं?
अरमान मेरे भी खूबसूरत हैं।
हवा के मद में
जो झूमने में मज़ा है।
उस आम के पेड़ को देखा
फलों से लदा है।
मेरे हिस्से के फल
मेरी चाहत हैं।
थोड़ी धूप, थोड़ी बदली
थोड़ी सी ज़मीं दे दो।
मुझे मेरा खुला आसमाँ दे दो।
रुचि शुक्ला
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