कौआ और कोयल
कौई बोले छः अण्डे थे,
कौआ बोले आठ।
लकड़ी-तारों के उस गढ़ में,
तीर चलें दिन-रात।
दूर डाल से कोयल ताके,
कौओं का संग्राम।
क्या जानें ये कुछ इनके हैं,
मेरे कुछ हैं साथ।
पूस चढ़ा, फ़ागुन आने को
सबकी लगी ये आस।
फ़ुदकेंगे कुछ नन्हें चूज़े
लाएँगे संग बहार।
लड़ते सेते वक्त आ गया
चूज़े निकले पाँच।
छोड़ लड़ाई कौए ने
बच्चे पोसे साथ।
कुछ ऐसे, कुछ वैसे बच्चे
रहते कैसे साथ।
कोयल के बच्चों ने मारी,
द्विज सुता को लात।
चूज़ा गिरा, वेदना भारी
कौआ करे रुदान।
कोयल झूम, खुशी से कुहके
करे वंश का गान।
रसिक बोल से उसने लूटा,
जनमानस का प्यार।
कौए के रौदन से उसको,
पत्थर पड़ते चार।
दोष कहें जग का या उसका,
जिसने रचा ये रास।
हे प्रभु तुम ही जानों,
अपनी लीला आप।
रुचि शुक्ला
Nice poem.. it helped me
ReplyDelete🙏
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