मुझे मेरी माँ की मोहब्बत ने पाला
पापा ने फिर मुझको चलना सिखाया
ताउम्र जिंदगी के पाठ पढ़ मैं
कुछ प्रश्न जमाने से पूछती हूँ
अगर इस धरा पर, एक तुम ही बचो
और आत्मदम्भ की कोई गूँज न हो
तब सोच कर मुझे ये बता दो
किस आत्मग्लानि का अनुभव करोगे?
और ये बता दो, उस घड़ी पर खास
पहले-पहल क्या ख्वाहिश करोगे?
एक प्रश्न बेहद सीधा सरल है
जिस बात पर तुम ताउम्र लड़े थे
उस वक्त उसका क्या मोल होगा?
क्या मलकियत की कीमत बचेगी,
क्या भोग उसका तुम कर सकोगे?
इन्सा हो, इंसानियत छोड़ कर तुम
किस धर्म के मद में झूमते हो
ये देश भक्ति कैसी तुम्हारी
जब माँ की इज़्ज़त,
ताक धर तुम खड़े हो।
रुचि शुक्ला
