मास - ऊर्जा परिवर्तन
एक विस्तार है इतना
कि निगाहें देख न पाएँ
एक सूक्ष्म है इतना
कि ज्योति ढूंढ़ न पाए
दुरूह राज़ है इतना
नज़ारा एक जैसा है ।
तुम ब्रह्ममाण्ड को जानो
या कणभेद को समझो
अंदर और बाहर का
नज़ारा एक जैसा है ।
बहती तरंगें हों
सोना हो या मिट्टी हो
पल - पल रूप बदलने का
नज़ारा एक जैसा है ।
रुचि शुक्ला
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