साज़ की आवाज़
आसमान की सीमा को
क्या नाप सकेगा ए इन्सान
खुद को कितना जान सका
जो जान सकेगा ये संसार
कितनी मूरत राह मिलेंगी
समझ सकेगा कितनों को
कितनी गिरहें रोज़ गुथेंगी
ले साथ चलेगा कितनों को
रज मोह छोड़, तज राह गुज़र
उस साज़ की आवाज़ बन
दृग पलट देख, ले फलक देख
राह खुली परवान तक ।
रुचि शुक्ला
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