चाह
कुछ कदम आगे बढ़ी
चाह दिल में आ जगी
एक हिलोर दे हवा ने
मोड़ डग पीछे किये
देखती हूँ आज खुदको
हूँ वहीं फिर आ खड़ी।
रोज़ खुद को तौलती
आप ही में झाँकती
क्या कहूँ इस बात पर
खुद में खुद को खोजती।
नित नया रहता सफ़र
हाथ लगता पर सिफ़र
पा ही लूँगी एक दिन
हठ की ये आदत लगी।
पार चालीस कर लिए
बालपन मन में वही
रो के, हँस के नाच-गा के
चाँद पाना है धरा पे।
मौज मस्ती की लहर सी
दौड़ रग-रग में रही
चल पड़ी मैं आज फ़िर से
पाने को मंज़िल मेरी ।
रुचि शुक्ला
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