नज़रिया
ऐ जिंदगी तेरी आज़माइस से
मैं सवंर गई
है शुक्रिया तेरा; कि आज मैं
कुछ और निखर गई
मेरा गुमा नहीं
न तेरी शिकस्त है
करवटें तेरी जीना सिखा गईं
लगा तो था मुझे
गहरा समुद्र है, कैसे बचूँगी मैं
आत्मबल मेरा; थामता रहा
सोच के तले नज़र बदल गई
तेरी गली वही, मेरा सफ़र वही
अहसास कर रही दुनिया बदल गई ।
रुचि शुक्ला
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