इश्क
चाँद का दीदार कर
गुदगुदाते मन से आवाज़ आती है
बड़ा खूब है ये फ़ासला
जो आज भी प्यार को समेटे हुए है
आग़ोश से चाँदनी बिखरा रहा वो
उँगलियाँ ज़ुल्फ़ में फहरा रहा हो
आब का आभास देता ये मरुस्थल
बावस्ता मोह में जकड़े खड़ा है
डोर भी सूत सी कच्ची नहीं है
गई पीढ़ियाँ गवाहियत ये दे रही हैं
बड़ा ख़ूब है ये फ़ासला
बना रहे बस
मेरे ख्वाब का ये सिलसिला
चलता रहे बस
तुझे देखना, निहारना चाहत रही है
तेरी चाँदनी चूमे युहीं हसरत यही है।
-रुचि शुक्ला

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