सुनेगा कौन?
किसी को हो गुमा तो हो
हमें नहीं है
कलम में दम है
हमें यक़ीं नहीं है
दास्ताने जहाँ की
जीत की ज़ुबानी रहीं
गीत उसी के बने
जहाँ फ़तेह की कहानी रही
कहने को कलम
इंकलाब लाती है
सच तो ये है
लेखनी उतनी ही बचती है
कि अधूरी सी कहानी सुनाती है
हमारी यादें, हमारी धरोहर
सबकी कुछ सीमाएँ हैं
अश्वत्थामा हतः
इतनी ही सच्चाई है
जो दिखा, जो जाना, जो समझा
वही दायरा बना
सब कुछ है अधूरा सा
पर पूरा फ़साना बना
सब छोड़, दरकिनार कर
भूलना चाहा
चुप रहे तो हुई कोफ़्त
कि बोलेगा कौन
और कहने पर
यक़ीं नहीं, कि सुनेगा कौन?
- रुचि शुक्ला

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