वो ताउम्र मेरे साथ थी
मेरी सच्ची राज़दार थी
हर कमी जानती थी
मेरी खूबियाँ पहचानती थी
मेरी गलतियाँ मेरे मुँह पर बताती थी
वो डराती नहीं थी
मुझे जीत का रास्ता सुझाती थी।
जब भी थकी
उसकी गोद हाज़िर थी
वो कब, कैसे, क्या जादू कर देती
पता नहीं
पर हर बार, नई जान फूँक देती थी
मेरे साथ मेरे विचारों की उथलपुथल
उसकी अपनी ही थी
भावुक सी दिखने वाली वो
कब क्या केमिकल लोचा कर देती
पता नहीं
हर उलझन से बेख़बर हो
मैं नई राह पर
बड़े शान से बढ़ चलती।
सच्ची सहेली, हमसफर, जान
आज भी मेरे साथ है
मेरा उस पर भरोसा
कुछ इस कदर है
कि वो है तो मैं हूँ
और मेरा होना उसी से है..
रुचि शुक्ला

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