Friday, 28 March 2025

वो साथ थी

                            


                        वो साथ थी

वो ताउम्र मेरे साथ थी

मेरी सच्ची राज़दार थी

हर कमी जानती थी

मेरी खूबियाँ पहचानती थी

मेरी गलतियाँ मेरे मुँह पर बताती थी

वो डराती नहीं थी

मुझे जीत का रास्ता सुझाती थी।

जब भी थकी  

उसकी गोद हाज़िर थी

वो कब, कैसे, क्या जादू कर देती

पता नहीं

पर हर बार, नई जान फूँक देती थी

मेरे साथ मेरे विचारों की उथलपुथल

उसकी अपनी ही थी

भावुक सी दिखने वाली वो

कब क्या केमिकल लोचा कर देती 

पता नहीं 

हर उलझन से बेख़बर हो

मैं नई राह पर

बड़े शान से बढ़ चलती।

सच्ची सहेली, हमसफर, जान

आज भी मेरे साथ है

मेरा उस पर भरोसा

कुछ इस कदर है

कि वो है तो मैं हूँ

और मेरा होना उसी से है..

                            रुचि शुक्ला 


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