तुम आगे बढ़ो
हर नज़र अलग ही चित्र बनाती रही
हर किसी का अलग था नज़ारेवयां
गिले-शिकवे, शिकायतें सभी की रहीं
जो ब्योरा दिया, वो कुछ और था
जो निरूपित हुआ, वो अलग बात थी
कदाचित आयाम का फेर था
और तस्वीर क्या-से-क्या बन गई
वो तस्वीर थी, तो छोड़ो उसे
वो तुम नहीं
तुम तो आगे बढ़ो
ये क्षितिज बस नजर का फेर है
इसमें क्या और कैसी दलील
स्याद् पर बात हो
तो कुछ पहलू भी हों
बस एक सच रहे
तो क्या बात हो
तुम आगे बढ़ो
बस आगे बढ़ो
फिक्र दुनिया-जमाने की
किनारे धरो
तुम आगे बढ़ो...
- रुचि शुक्ला

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