कुछ फ़ासला मुनासिब रखना
कुछ सीखा था किताबों से
कुछ तालीम लोगों से मिली
न मिले सुकूँ जहाँ
वहाँ बेगानियत रखना
हर ज़रे से मोहबत सही
ये कवायत, फिर भी याद रखना
जो नाकाबिल हो, साथ के
कुछ फ़ासला मुनासिब रखना
इल्तज़ा जिंदगी की
बस इतनी ही है
अपनी सोच को
'बज़्म-ए-गंद' से महफूज़ रखना ।
रुचि शुक्ला
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