Thursday, 23 April 2026

मुसाफ़िर हूँ यारों

 


             मुसाफ़िर हूँ यारों

पनाहगार को दफ़ा करने का

जो सिलसिला चला है

कहाँ तक जाएगा

है ठिकाना, अपना ही किसे पता

सब मेहमाँ हैं, 

फिर जाना ही हक़ीक़त समझ

कोई और ही क़ाबिज़ होगा

अपनी रुख़्सती के पहले

अब पुरखों की खोज

क्या करें

वो भी ख़ानाबदोश ही रहे होंगे

सो हम भी हैं

और तुम भी

अब मुसाफ़िर तुम ही कहो

जो किसी और धारा के हुए

तो कहाँ जाएँगे

आज वक्त है 

तो जी लें सुकूँ से

न दिया वक्त उसने 

तो कहाँ जाएँगे...

              - रुचि शुक्ला

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