Tuesday, 29 March 2022

कलरव

 

                             कलरव

जब कलरव करती चिड़िया भी

कोलाहल करती लगती हो

राह दिखाने वाला तुमको 

पथ-भ्रमित कर देता हो

और लगे, थाली में भर-भर

झूठ परोसा जाता है

रुक जाना पलभर को तब

कुछ पन्ने पलटा लेना

दरिया में बहने से पहले

थोड़ा ठोक-बजा लेना

इंद्रधनुष की ओढ़ चुनरिया

थिरक रही किरणों के संग 

पलभर रास रचा लेना

और फैला इन हाथों को

कुछ देर हवा को थाम-जिगर

दिलसाज़-ए-तार हिला लेना

या इठलाती बाला संग

अपने नैन लड़ा लेना

ले हाथों में नन्हा बालक

थोड़ा सा तुतला लेना

हो सम्भव, कुछ देर सही

मिट्टी में लोट लगा लेना

जब बदला सा संसार लगे

सब कुछ बिल्कुल साफ दिखे

तब सीने की धड़कन से 

जो सरगम उठ आएगी

और अपनी मीठी वाणी का 

करतब तुम्हें दिखाएगी

वो सत्य, अहिंसा, सदाचार का

सच्चा पथ दर्शाएगी..

                       रुचि शुक्ला...

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