Wednesday, 30 March 2022

हम, हम और हम

 

                        हम, हम और हम 

हम इन्सान हैं

हमने औकात में रहना नहीं सीखा

बोलना तो आया

मगर कहना नहीं सीखा

कभी डॉली को जन्म दे

पुरुष के अस्तित्व को नकारा 

और कभी आसमा में छेद कर

इतिहास और भविष्य का 

भेद ही मिटा दिया

हम इन्सान हैं

हमने औकात में रहना नहीं सीखा

कभी सूक्ष्मता के पार गए

कभी हर वृहदता को लाँघ गए

हमने मौसम को 

अपने इशारों पर नचाया 

हर ऊँचाई को

अपने पैरों तले रौंदा

क्या बताएँ

हम अपने से बेहतर 

इन्सान बनाने का हुनर रखते हैं

मगर आज भी

जर, जोरू और जमीन

पर लड़ मरते हैं

हम इन्सान हैं

हमने औकात में रहना नहीं सीखा 

हम स्वयंभू बन जाएँ

ये भी संभव है

हम चुनौतियों से इश्क करते हैं

कई इबारतें रोज़ लिखते हैं

नित नई खोज कर

नव आकाश गढ़ते हैं

होनहार, क़ाबिल 

और समझदार हैं हम

उससे भी ज्यादा बीमार हैं हम

कल ही जाना था

ये खेल उतना ही बाकी है

जब तलक ये पटल हमारा है

सब भूल गए

और गुमा ग़ज़ब का हावी है

कि हम, हम और हम 

बस हम ही बाकी हैं।

                            रुचि शुक्ला...


यह कविता YouTube पर सुनने के लिए Please Visit https://youtu.be/UII-Fdaigbw

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