मेरा क़सूर
डूबती नाव का खेवैया सो रहा है
आधा हुजूम क्या कहें, किसी नशे में है
पर्दा नज़र पर डाल वो
सच को छुपा रहा
सोच का विकार मान
जग को घुमा रहा
जो मर गए, वो मर गए
उनकी क्या बात हो
जो जी गए
उत्सव चलो उन्हीं के साथ हो
दोष गिन कब तलक खफ़ा रहोगे तुम
यकीं करो हर घाव का इलाज़ वक्त है
देखना एक रोज़ तुम आप कहोगे
शायद मेरी समझ में ही
कहीं कुछ फेर था
वर्ना इस जहाँ में
कुछ भी तो कम नहीं....
रुचि शुक्ला....

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