Monday, 19 April 2021

मृदुल याद

  


                        मृदुल याद

रह-रह कर भूली-बिसरी सब 

मृदुल याद सी आती हैं।

जैसे कि गीली मिट्टी से

भीनी सी खुशबू आती है।

वो मेरी नानी का घर था

जिसकी खूब कहानी हैं।

वो मेरे बचपन के दिन थे

मुझको याद जुबानी हैं।

लोट न थकते धूले में

फिर भर-भर लोट नहाते थे।

तपते घामे खेल खिलोने

बारिश के ओले खाते थे।

कितने सारे भाई-बहन थे

लड़ते और मनाते थे।

लोगों से पिटने के डर से

कई-कई बात छिपाते थे।

इस छज्जे जो देखे कोई

उस छज्जे कूद लगाते थे।

छक जाएँ घर वाले सब

इतनी धूम मचाते थे।

शादी और बरातों के

मीठे पान भी खाते थे।

माँ पूछे जो, क्या खाया है

जामुन का नाम लगाते थे।

एक बार बस, कह दे कोई

झट अपना नाच दिखाते थे।

मौसी, गुड़िया सी देती थी

मामी से बरतन लाते थे।

गुड्डा तेरा, गुड़िया मेरी..

तू बाराती, मैं जनाती..

क्या-क्या बातें करते थे

दीदी से डाँट भी सुनते थे।

लेकिन फिर बसअड्डे की

चाट-पकौड़ी खाते थे।

चूरण वाले का चूरण खा

चट-चट मुँह चटखाते थे।

कभी बर्फ का गोला खाते

कभी समोसा पार लगाते।

घर के बाहर लगे वृक्ष पर

जल भी थे हम रोज चढ़ाते।

आज परीक्षाफल न आए

बाल चाह बस इतनी करते।

रात को छत पर तारे गिनते

ढेर कहानी मन-भर सुनते।

कुछ नानी की, कुछ मामा की

कुछ नाना की थीं अलग कहानी।

सबका मनका अलग-अलग था

मन का उनसे तार लगा था।

क्या दिन थे, क्या रातें थीं

बस यूँहीं कट जाती थीं।

फिर विदा का भर पिटारा

अपने घर आ जाते थे।

ऐसी थी गर्मी की छुट्टी  

कितनी कमतर लगती थीं।

जैसे हों कल की ही बातें

ताज़ी-ताज़ी लगती हैं।

                             रुचि शुक्ला

2 comments: