दुनियादारी
भौंरा मेरे दर आँगन में; रोज़ आता है।
मुझको लगता है; वो कितना मीठा गाता है।
रंग-रंगीले फूलों से; उसको रिझाता मैं।
खुशबू की आगोश में ले; कुछ पास बुलाता मैं।
धीरे-धीरे पास में आ; वो लौट जाता है।
मेरे फूलों का रस यूँहीं; रोज़ चुराता है।
कितना निरमोही है भौंरा, लोग कहते हैं।
चोर, चतुर, छलिया; होने का दोष देते हैं।
क्या बतलाऊँ तुमको मैं; कुछ और कहानी है।
मेरी डाल लगे फल; उसके सदउपकारी हैं।
उसका मेरा लेना-देना; बहुत पुराना है।
इसको ही तो दुनियादारी; आप कहते हैं।
-रुचि शुक्ला

Very nice
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ReplyDelete🙏
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