Saturday, 9 January 2021

दुनियादारी


                        दुनियादारी


भौंरा मेरे दर आँगन में; रोज़ आता है।

मुझको लगता है; वो कितना मीठा गाता है।


रंग-रंगीले फूलों से; उसको रिझाता मैं।

खुशबू की आगोश में ले; कुछ पास बुलाता मैं।


धीरे-धीरे पास में आ; वो लौट जाता है।

मेरे फूलों का रस यूँहीं; रोज़ चुराता है।


कितना निरमोही है भौंरा, लोग कहते हैं।

चोर, चतुर, छलिया; होने का दोष देते हैं।


क्या बतलाऊँ तुमको मैं; कुछ और कहानी है।

मेरी डाल लगे फल; उसके सदउपकारी हैं।


उसका मेरा लेना-देना; बहुत पुराना है।

इसको ही तो दुनियादारी; आप कहते हैं।

                                         -रुचि शुक्ला 


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